मीणा विद्रोह ( 1851 – 1860 )

मीणा विद्रोह ( 1851 – 1860 )

नई भूमि व राजस्व व्यवस्था के प्रति अपना रोष प्रकट करने के लिए 1851 ई. में उदयपुर राज्य के जहाजपुर परगने के मीणाओं ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। इस क्षेत्र की मीणा जाति पर्याप्त रूप में किसी भी राजनीतिक सत्ता से मुक्त थी, केवल महाराणा मेवाड़ की प्रतीकात्मक सत्ता स्वीकार करते थे। कर्नल टॉड ने इनका जीवन्त विवरण प्रस्तुत किया है, जो उपर्युक्त तथ्य को सिद्ध करता है। ये अंग्रेज ही थे, जो इस क्षेत्र पर उदयपुर राज्य का कठोर नियंत्रण स्थापित कर सके। ब्रिटिश शासित अजमेर प्रान्त के समीप स्थित इस मीणा क्षेत्र पर राज्य की सत्ता स्थापित हो सकी थी। वास्तव में अंग्रेज आदिवासी समुदायों के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रसित थे। इसलिए अंग्रेज इन लोगों के साथ बड़ी कठोरता का व्यवहार करते थे। 1820 21 में अंग्रेजों द्वारा मेरों के दमन से मीणा समुदाय के लोग भली भाँति परिचित थे। अतः जहाजपुर क्षेत्र के मीणा समुदाय तथा अंग्रेज अधिकारियों के मध्य विरोध अस्तित्व में आया । मीणा व भीलों के विद्रोह केवल अंग्रेजो के विरुद्ध ही नहीं थे, बल्कि वे संबंधित रियासतों के विरुद्ध भी थे । जिनके माध्यम से अंग्रेज अपनी नीतियों को कार्यान्वित करवा रहें थे ।

महाराणा मेवाड़ ने 1851 ई. में जहाजपुर परगने में नया हाकिम नियुक्त किया। नवनियुक्त हाकिम मेहता रघुनाथ सिंह परगने से धन कमाने में व्यस्त था। उसने अपना ध्यान मुख्य तौर पर परगने की आय में वृद्धि तथा खर्चे मे कमी पर केन्द्रित किया। प्रशासनिक सुधारों के नाम पर जनता से धन वसूली की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप बहुसंख्यक मीणा समुदाय ने विप्लव का रास्ता अपनाया। विद्रोही मीणाओं ने ना केवल राजस्व अधिकारियों व सूदखोरों को लूटा, बल्कि समीप स्थित अजमेर-मेरवाड़ा के अंग्रेजों के प्रान्त पर भी धावे मारे। अंग्रेज अधिकारियों की शिकायतों के आधार पर महाराणा ने हाकिम का स्थानान्तरण कर मेहता अजीत सिंह को विद्रोही मीणाओं के दमन के कठिन कार्य को पूरा करने के उद्देश्य से हाकिम नियुक्त किया। वह उदयपुर से एक सेना लेकर रवाना हुआ। इसके साथ शाहपुरा, बनेड़ा, बिजौलिया, भैंसरोड़, जहाजपुर एवं मांडलगढ़ के जागीरदारों की सेनाएँ सम्मिलित थी। इनके अतिरिक्त भीम पल्टन व एकलिंग पल्टन के सिपाही दो तोपों सहित इस सेना के साथ जोड़े गए। एजेन्ट टू गवर्नर जनरल इन राजपूताना के कहने पर जयपुर, टोंक एवं बूंदी राज्यों ने अपने राज्य की सीमाओं पर चौकसी पक्की कर दी, जिससे जहाजपुर के मीणाओं को अन्य राज्यों के मीणाओं द्वारा सहायता व समर्थन की सम्भावना को समाप्त कर दिया गया।

उदयपुर की सेनाओं ने छोटी लुहारी व बड़ी लुहारी नामक गांवों पर आक्रमण किया. जो मीणा-विद्रोह के मुखियाओं के गांव थे। सेनाओं ने दोनों ही गांवों को नष्ट कर दिया तथा मीणा सपरिवार मनोहरगढ़ एवं देवखेड़ा की पहाड़ियों की ओर भागे, वहाँ उन्होंने रक्षात्मक स्थिति प्राप्त कर ली थी। इसी बीच जयपुर, बूँदी, टोंक राज्यों से तमाम प्रतिबन्धों के उपरान्त भी लगभग 5000 मीणा लोग जहाजपुर के मीणाओं की सहायतार्थ पहुँच गए थे। उदयपुर की सेनाओं ने भरसक प्रयत्न किए, किन्तु सघन झाडियों व पहाड़ी प्रदेश होने के कारण सैनिक कार्रवाई में अनेक रुकावट उत्पन्न हो रही थी, इसलिए इस सेना को कोई सफलता नहीं मिली। राज्य सेना के लगभग 57 सिपाही इस अभियान में मारे गए।

दिसम्बर, 1854 में एजेन्ट टू गवर्नर जनरल इन राजपूताना, मेवाड़ का पॉलिटिकल एजेन्ट, व हाड़ौती का पॉलिटिकल एजेन्ट संयुक्त रूप से सेना सहित जहाजपुर पहुँचे तथा जहाजपुर व ईटोदा में एक महिने तक रुके रहे। जनवरी, 1855 के अन्त तक मीणा विद्रोही इस सेना के समक्ष आत्मसमर्पण के लिए बाध्य हो गए थे। भविष्य में मीणाओं का सामना करने के उद्देश्य से फरवरी, 1855 में जयपुर, अजमेर, बूंदी एवं मेवाड़ की सीमाओं पर स्थित देवली में एक सैनिक छावनी स्थापित की। मीणाओं पर नियमित निगरानी रखने के ध्येय से छावनी के आस-पास पुलिस थाने भी स्थापित किए गए। इस प्रकार मीणाओं का विद्रोह दबाया जा सका।

1855 ई. में देवली छावनी को नवगठित अनियमित सेना का मुख्यालय बनाया गया था, जो 1857 से 1860 के दौरान 42वीं देवली रेजीमेन्ट अथवा मीणा बटालियन के नाम से जानी जाती रही। 1921 में 42वीं देवली रेजीमेन्ट व 43वीं एरिनपुरा रेजीमेन्ट को समाप्त कर दिया। उनके स्थान पर मीणा कोर की स्थापना की गई थी। देवली ने इस सेना का गठन राजस्थान में आदिवासियों के प्रति अंग्रेजी नीति का विस्तार कहा जा सकता है। वास्तव में इस तरह के दमनात्मक उपायों का विस्तार आदिवासी समस्या का समाधान नहीं था, किन्तु नवगठित अमानवीय व अपवित्र औपनिवेशिक व सामन्ती मेल द्वारा स्थापित राजनीतिक सत्ता से और कुछ आशा नहीं की जा सकती थी।

पुन: जनवरी, 1860 में जहाजपुर के मीणाओं ने विद्रोह कर दिया। महाराणा ने 29 जनवरी, 1860 को चन्दसिंह के नेतृत्व में जहाजपुर की ओर एक सेना भेजी। उसने गाढ़ोली व लुहारी गांवों पर आक्रमण किया। राज्य सेना ने गांवों को लूटा व आगजनी भी की। भारी संख्या में मीणाओं को बन्दी बनाया गया तथा 6 लोगों को तोप से उड़ा दिया गया था। मीणाओं पर पुलिस थानों में नियमित उपस्थिति थोप दी गई थी। इस प्रकार जहाजपुर का मीणा विद्रोह अन्तिम रूप से नियंत्रित हो गया था।

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