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राजस्थान के प्रमुख किसान आंदोलन – 2

राजस्थान के प्रमुख किसान आंदोलन - 2

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बेगूं किसान आंदोलन, मेवाड़ (1921 ई.) :

बिजौलिया आंदोलन से प्रेरणा पाकर बेगूं (मेवाड़) के किसानों ने भी अनावाश्यक व अत्यधिक करों, लाग-बाग, बैठ-बेगार व सामन्ती जुल्मों के विरुद्ध रामनारायण चौधरी के नेतृत्व में 1921 ई. में आंदोलन शुरू किया। बेगूं के किसान 1921 ई. में मैनाल के भैरुकुण्ड नामक स्थान पर एकत्रित हुए। सामन्ती दमन चक्र चलता रहा, 1923 ई. में किसानों के प्रमुख रूपाजी व कृपाजी धाकड़ सेना की गोलाबारी से शहीद भी हुए, लेकिन किसान अपनी मांगों के लिए जूझते रहे। यद्यपि बेगू के ठिकानेदार ने कृषकों से समझौता करने का प्रयास भी किया, लेकिन उसे अमान्य कर बेंगू आंदोलन को बुरी तरह से कुचला गया। किंतु मेवाड़ सरकार आंदोलन को दबा नहीं सकी। बेगूं के ठाकुर अनूपसिंह एंव राजस्थान सेवा संघ के मध्य जो समझौता हुआ, जिसे ‘बोल्शेविक समझौते की संज्ञा दी गई।

भरतपुर किसान आंदोलन :

भरतपुर राज्य में किसानों की दशा अच्छी थी। यहाँ 95 प्रतिशत भूमि सीधे राज्य के नियंत्रण में थी। यहाँ 5 जातियां ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, अहीर एवं मेव कमोबेश समान हैसियत रखती थीं। भरतपुर राज्य में 1931 में नया भूमि बन्दोबस्त लागू किया गया जिससे भू-राजस्व में वृद्धि हो गई। भू-राजस्व अधिकारी लम्बरदारों ने इस बढ़े हुए भू-राजस्व के विरोध में आंदोलन शुरू किया।

जब राज्य ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया तो 23 नवम्बर, 1931 को ‘भोजी लम्बरदार’ के नेतृत्व 500 किसान भरतपुर में एकत्रित हुए। भोजी लम्बरदार ने राज्य के विरुद्ध भड़काऊ भाषण दिए। नवम्बर, 1931 में ‘भोजी लम्बरदार’ को गिरफ्तार कर लिया गया जिससे यह आंदोलन समाप्त हो गया।

मेव किसान आंदोलन :

अलवर, भरतपुर क्षेत्र में मोहम्मद हादी ने 1932 ई. में अन्जुमन खादिम उल इस्लाम’ नामक संस्थास्थापित कर मेव किसान आंदोलन को एक संगठित रूप दिया। अलवर के मेव किसान आंदोलन का नेतृत्व गुडगांव के ‘चौधरी यासीन खान’ द्वारा किया गया। इसके नेतृत्व में किसानों ने खरीफ फसल का लगान देना बंद कर दिया। राज्य सरकार ने मेवों को संतुष्ट करने के लिए राज्य कॉन्सिल में एक मुस्लिम सदस्य खान बहादुर काजी अजीजुद्दीन बिलग्रामी को सम्मिलित कर लिया। इसके बावजूद आंदोलन न केवल तेज हुआ, बल्कि उग्र भी हो गया। 1937 में मि. बिलग्रामी के मातहत मेव संकट की जांच हेतु एक विशेष समिति का गठन किया गया। इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर मेवों को भू-राजस्व तथा अन्य करों में छूट के साथ-साथ सामाजिक व धार्मिक समस्याओं का समाधान भी किया गया।

अलवर किसान आंदोलन एवं नीमूचाणा हत्याकाण्ड (1921-1925) :

अलवर रियासत में जंगली सुअरों को अनाज खिला कर रोधों में पाला जाता था। ये सुअर किसानों की खड़ी फसल बर्बाद कर देते थे। उनको मारने पर भी रियासती सरकार ने पाबंदी लगा रखी थी। सुअरों की समस्या के निराकरण हेतु किसानों ने 1921 में आंदोलन शुरू किया। अंततः सरकार ने समझौता कर किसानों, को सुअर मारने की इजाजत दे दी। 1923-24 में अलवर महाराजा जयसिंह ने लगान की दरों को बढ़ा दिया। विरोधस्वरूप 14 मई, 1925 को लगभग 800 किसान अलवर के नीमूचाणा गांव में एकत्र हुए। उस सभा पर सैनिक बलों ने मशीनगनों से अंधाधुंध फायरिंग की, जिससे सैकड़ों लोग मारे गए। महात्मा गांधी ने इस कांड को ‘जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड से भी वीभत्स’ बताया और उसे डायरवाद गहरा एवं व्यापक की संज्ञा दी। अंततः सरकार को लगान के बारे में किसानों के समक्ष झुकना पड़ा, और आंदोलन समाप्त हुआ ।

बूंदी राज्य में किसान आन्दोलन :

बिजौलिया और बेगूं के किसानों के समान बूंदी राज्य के किसानों को भी अनेक प्रकार की लागे (लगभग 25), बेगार और ऊँची दरों पर लगान की रकम देनी पड़ रही थी। बिजौलिया और बेगू के किसानों के आन्दोलन से वे अत्यधिक प्रभावित हुए थे। परिणामतः अप्रैल, 1922 ई. में बिजौलिया की सीमा से जुड़े बून्दी राज्य के बरड़ क्षेत्र के किसानों ने बून्दी प्रशासन के विरुद्ध आन्दोलन आरम्भ कर दिया। इस आन्दोलन का नेतृत्व राजस्थान सेवा संघ के कर्मठ कार्यकर्ता नैनूराम के हाथों में था।

बूंदी राज्य ने इन किसानों पर अत्याचार प्रारम्भ कर दिए। राजस्थान सेवा संघ के माध्यम से बून्दी राज्य में चल रहे दमनचक्र की सर्वत्र निन्दा की गई। 2 अप्रैल, 1923 ई. को डाबी गांव में किसानों की एक सभा हुई। सभा में एकत्रित किसानों की भीड़ पर पुलिस ने निष्ठुरता से लाठी प्रहार किया तथा गोलियां चलाई, जिसके परिणामस्वरूप नानक भील और देवलाल गुर्जर शहीद हुए। बून्दी राज्य की इस घटना की सर्वत्र निन्दा की गई। बून्दी सरकार ने किसानों की कुछ शिकायतों का निवारण किया और लाग-बाग और बेगार में कुछ रियायतें दी। किसान आन्दोलनकारी राज्य की ओर से दी गई रियायतों से पूर्णतया सन्तुष्ट तो नहीं थे, परन्तु वे अपने आन्दोलन को आगे चलाने की स्थिति में भी नहीं थे, क्योंकि अब उन्हें राजस्थान सेवा संघ से मार्गदर्शन मिलना बन्द हो गया था। 1923 ई. के अन्त तक आन्दोलन प्रायः समाप्त हो गया। 1936 ई. में एक बार फिर बरड़ क्षेत्र में आन्दोलन का दौर चालू हुआ।

5 अक्टूबर, 1936 ई. की हिन्डोली में स्थित हूडेश्वर महादेव के मन्दिर में 90 गाँवों के गुर्जर-मीणा किसानों के 500 प्रतिनिधियों का एक विराट सम्मेलन हुआ, जहाँ उन्होंने एक माँग-पत्र तैयार किया और उसे सरकार को प्रेषित किया। सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया। किसानों ने राज्य के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया, जो लम्बे समय तक चला। अन्ततः सरकार ने चराई करों में कुछ छूट दी और युद्ध ऋण की वसूली में शक्ति का प्रयोग बन्द कर दिया। आन्दोलन के समय जिन लोगों को गिरफ्तार कियागया उन्हें छोड़ दिया गया। इस प्रकार यह आन्दोलन समाप्त हो गया।