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राजस्थान के प्रमुख किसान आंदोलन – बिजौलिया आन्दोलन

राजस्थान के प्रमुख किसान आंदोलन - बिजौलिया आन्दोलन

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राजस्थान में ब्रिटिश सरकार के आधिपत्य की स्थापना के पश्चात् यहाँ आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियों में परिवर्तन आया। शासक अंग्रेजी संरक्षण के कारण स्वयं को सुरक्षित मानने लगे तथा अपनी किसान जनता के प्रति निरंकुश होने लगे। साथ ही अंग्रेजों की नीतियों के कारण कुटीर उद्योग धंधे बर्बाद होने लगे तथा भूमि पर आश्रित जनसंख्या का प्रतिशत बढ़ने लगा। इस प्रकार अब किसानों में असंतोष बढ़ता गया, जिसका परिणाम विभिन्न किसान आंदोलनों के रूप में सामने आया।

बिजौलिया आन्दोलन :

बिजौलिया जो वर्तमान में भीलवाड़ा जिले में स्थित है, मेवाड़ राज्य में प्रथम श्रेणी का ठिकाना था। इस जागीर की भौगोलिक बनावट इस प्रकार थी कि यहाँ के किसान आन्दोलन के समय बड़ी सुगमता से पड़ोसी सीमावर्ती राज्यों में पलायन कर सकते थे। यहाँ के अधिकांश लोगों का जीवन निर्वाह कृषि पर आधारित था। कृषकों में अधिकांश धाकड़ जाति के लोग थे। वे अपने परिश्रम और दक्षता के लिए प्रसिद्ध थे । जाति के रूप में वे संगठित थे तथा पंचायत व्यवस्था में उनकी दृढ़ निष्ठा थी। 1894 ई. में राव गोविन्ददास की मृत्यु के बाद बिजौलिया ठिकाने के जागीरदारों व किसानों के संबंधों में विभिन्न कारणों से कटुता आई, जिसका परिणाम था बिजौलिया किसान आन्दोलन । बिजौलिया किसान आन्दोलन का अध्ययन तीन भागों में किया जा सकता है- प्रथम चरण 1897

ई. से 1915 ई. तक का था। इस काल में आन्दोलन का नेतृत्व स्थानीय लोगों द्वारा किया गया। आन्दोलन का द्वितीय चरण 1915 ई. से आरम्भ हुआ, जो 1923 ई. तक चला। आन्दोलन का यह काल अत्यन्त महत्वपूर्ण था। इस काल में आन्दोलन का संचालन राष्ट्रीय स्तर के योग्य व अनुभवी व्यक्तियों द्वारा सम्पन्न हुआ। अब यह आन्दोलन राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ गया था। तीसरा चरण आन्दोलन का पराभव काल था, जो 1941 ई. में समाप्त हुआ।

1897 ई. में बिजौलिया ठिकाने के हजारों किसान एक मृत्यु भोज के अवसर पर गिरधरपुरा गांव में एकत्रित हुए । यहाँ ठिकाने के अत्याचार व शोषण से संतप्त किसानों ने एक दूसरे से विचार-विमर्श किया और निर्णय लिया कि उनके प्रतिनिधि उदयपुर जाकर महाराणा फतहसिंह से भेंट कर न्याय के लिए पुकार करें किंतु इस पुकार का कोई परिणाम नहीं निकला।

रियासती सरकार द्वारा अपनाई गई निष्क्रियता व उदासीनता से बिजौलिया के शासक को किसान विरोधी नीति अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिला। बिजौलिया जागीर का किसान पहले से ही विभिन्न प्रकार की लागों की बोझ से दबा हुआ था। अब 1903 ई. में राव कृष्णसिंह ने बिजौलिया अंचल में एक नया कर चँवरी नाम से लगा दिया।

हर व्यक्ति को अपनी लड़की के विवाह के अवसर पर 13 रुपये (कुछ साक्ष्यों में पाँच रुपये लेना लिखा है) ठिकाने में जमा करवाना पड़ता था। फिर वर के लिए राव साहब के समक्ष उपस्थित होकर नतमस्तक हो आशीर्वाद प्राप्त करना आवश्यक था। इस अपमानजनक कर के लागू करने पर किसानों में रोष व्याप्त होना स्वाभाविक था।

किसानों ने इसका मूक विरोध किया। उन्होंने 2 वर्षों तक अपनी कन्याओं का विवाह ही नहीं किया। इसके बाद राव ने कुछ नाममात्र रियायतें दी, किन्तु संतुष्ट हाने के बजाय किसानों को अपनी शक्ति का अहसास अवश्य हुआ।1906 ई. में राव कृष्णसिंह का निःसन्तान देहांत हो गया। उसके स्थान पर उसका निकट का सम्बंधी पृथ्वीसिंह बिजौलिया का स्वामी बना। उसने मेवाड़ राज्य द्वारा नये जागीरदार से तलवार बधाई के रूप में ली गई रकम का भार जनता पर डाल दिया।

किसानों ने जब इसका विरोध किया, तो स्थानीय शासक ने किसान आन्दोलन से जुड़े व्यक्तियों के विरुद्ध सख्ती का रुख अपनाया और दमनकारी नीति का अनुसरण किया। किसान नेता साधु सीतारामदास को ठिकाने के पुस्तकालय से सेवामुक्त कर दिया गया। अन्य किसान नेताओं को जेल में डाल दिया।

1914 ई. में राव पृथ्वीसिंह का देहांत हो गया और उसका पुत्र केसरी सिंह अल्पवयस्क था, इसलिए जागीरी प्रशासन कोर्ट ऑफ वार्ड्स (महाराणा) के नियंत्रण में चला गया। किंतु किसानों को फिर भी कोई खास फायदा न हुआ, उनके हालात जस के तस थे। इन हालात में इस प्रकार इस आंदोलन का प्रथम चरण पूरा होता है।

इस आंदोलन का दूसरा चरण प्रारम्भ होता है. जब 1916 में विजय सिंह पथिक (वास्तविक नाम भूपसिंह) इस आंदोलन से जुड़ते है। विजयसिंह पथिक में कार्य करने की अपूर्व क्षमता थी। सर्वप्रथम उन्होंने किसानों को सुनियोजित रूप से संगठित किया तथा आन्दोलन को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया।

उन्होंने बिजौलिया में विद्या प्रचारिणी सभा का गठन किया, जिसके तत्वावधान में एक पुस्तकालय, एक पाठशाला और एक अखाड़ा चालू किया। ये राजनीतिक गतिविधियों के केन्द्र बन गए। माणिक्यलाल वर्मा, जो इस समय बिजौलिया ठिकाने में एक कर्मचारी के पद पर कार्यरत थे, पथिक के सम्पर्क में आए, उन्होंने पथिक से प्रभावित होकर ठिकाने की नौकरी से अवकाश ले लिया।

उन्होंने पथिक से आजीवन देश सेवा की दीक्षा ली और पथिक के साथ किसानों को संगठित करने के कार्य में जुट गए। इस कार्य में साधु सीतारामदास का भी पथिक को बड़ा सहयोग रहा। विजयसिंह पथिक ऊपरमाल क्षेत्र में अत्यधिक लोकप्रिय हो गए थे। वहाँ के निवासी उन्हें महात्माजी कहकर सम्बोधित करते थे।

उनके आदेशों का पालन करने के लिए वे सदैव तैयार रहते थे। पथिक किसानों की दुर्दशा से परिचित हो चुके थे। इस भयावह स्थिति के निवारण हेतु पथिक ने किसान आन्दोलन को सक्रिय बनाने का निर्णय लिया और 1917 ई. में हरियाली अमावस्या के दिन ऊपरमाल पंच बोर्ड के तत्वावधान में क्रान्ति का बिगुल बजाया। 

पथिक ने किसानों को युद्ध का चंदा नहीं देने के लिए आह्वान किया। किसानों ने घोषणा कीकि वे बेगार नहीं करेंगे। गोविन्द निवास गाँव के नारायणजी पटेल ने ठिकाने में बेगार करने से इन्कार कर दिया। इस पर ठिकाने के कर्मचारियों ने उसे पकड़ लिया और कैद में डाल दिया। इसकी सूचना मिलने पर किसान पंचायत के आदेशानुसार किसानों के जत्थे बिजौलिया पहुँचने लगे ठिकाने के प्रशासक भयभीत हो गए। उन्होंने नारायणजी पटेल को जेल से मुक्त कर दिया। किसानों की यह प्रथम विजय थी।

प्रारम्भ में ब्रिटिश सरकार बिजौलिया के आन्दोलनकारी किसानों को रियायत देने के पक्ष में नहीं थी। शनैः शनैः स्थिति में परिवर्तन आने लगा। अगस्त, 1920 ई. में भारत में महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन आरम्भ हुआ, जो 1921 ई. में भयंकर रूप ले चुका था।

ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार ने निश्चय किया कि बिजौलिया किसान आन्दोलन को तुरन्त शान्त

किया जाए। इस उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया, जिसमें ए.जी.जी.

रॉबर्ट हॉलैंड, उसके सचिव आगल्ली, मेवाड़ के ब्रिटिश रेजीडेन्ट विल्किसन, मेवाड़ राज्य दीवान

प्रभाषचन्द्र चटर्जी और राज्य के सायर हाकिम बिहारीलाल को रखा। लम्बे विचार-विमर्श के पश्चात् 11

फरवरी, 1922 ई. को ठिकाने और किसान पंचायत के बीच समझौता सम्पन्न हुआ।

20 जुलाई, 1931 ई. को सेठ जमनालाल बजाज ने उदयपुर में महाराणा तथा सर सुखदेव प्रसाद से व्यापक विचार-विमर्श किया, जिसके फलस्वरूप समझौता हो गया। हालांकि उदयपुर ने इसका पालन न किया, किंतु जब मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन का व्यापक प्रसार हो रहा था. तो इस भय से कि किसान प्रजामंडल से न जुड़ जाएँ. कुछ पहल आवश्यक थी। 1941 ई. में मेवाड़ के दीवान टी. विजय राघवाचार्य ने राजस्व मन्त्री डॉ. मोहनसिंह मेहता को बिजौलिया भेजा, जिन्होंने किसान नेताओं व अन्य नेताओं से बातचीत कर किसानों की समस्या का समाधान करवाया। किसानों को उनकी जमीनें वापसदे दी गई। इस प्रकार यह आन्दोलन समाप्त हुआ।