RBSE CLASS 10TH HINDI MODEL PAPER SOLUTION PDF 2023

खण्ड अ

प्रश्न 1. निम्नलिखित अपठित गद्यांश को पढ़कर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर लिखिए- (प्रश्न संख्या 1 से 5)

 जयशंकर प्रसादजी काशी के सुंघनी साहु के प्रतिष्ठित घराने में उत्पन्न हुए थे। यह घराना अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था। इन्होंने क्वींस कॉलेज में सातवीं कक्षा तक पढ़ा था पर घर में ही संस्कृत, अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, फारसी का व्यापक अध्ययन किया था। प्रसादजी मूलतः कवि थे। उनकी समस्त रचनाओं में उनका कवि हृदय झलकता है। उन्होंने प्रारम्भ में ब्रज भाषा में कविता लिखी। उनकी विधायनी कृतित्व की क्षमता का परिचय ‘झरना’ के प्रकाशन से सांकेतिक रूप में मिला। जहाँ तक छायावाद की प्रतिष्ठा का प्रश्न है, प्रसादजी ने उसका बीजारोपण ‘झरना’ में ही किया। ‘झरना’ के पश्चात् ‘आँसू’ का प्रकाशन काव्य के क्षेत्र की हिन्दी साहित्य में बहुत बड़ी घटना है।

1. उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक है-

(अ) छायावाद

(ब) सरस गीत

(स) जयशंकर प्रसाद

(द) झरना

2. प्रसादजी सम्बंधित थे—

(अ) सुंघनी साहु घराने से

(ब) कलवार घराने से

(स) ठाकुर घराने से

(द) हालदार घराने से

3. प्रसादजी ने सर्वप्रथम कौनसी भाषा में कविता लिखी ?

(अ) अवधी

(ब) ब्रज

(स) राजस्थानी

(द) हिन्दी

4. निम्न में से कौनसी रचना जयशंकर प्रसाद की है?

(अ) आँसू

(ब) झरना-संगीत

(स) लहरगीत

(द) विधायनी

5. जयशंकर प्रसाद ने छायावाद का बीजारोपण किस रचना में किया ?

(अ)‌ झरना

(ब) आंसू

(स) लहर 

(द) कामायनी

उत्तर

1. स

2. अ

3. ब

4. अ

5. अ

निम्नलिखित अपठित काव्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-(प्रश्न संख्या 6 से 10 )

 पूर्व चलने के बटोही,

बाट की पहचान कर ले।

है अनिश्चित, किस जगह पर 

सरित, गिरि, गह्वर मिलेंगे,

है अनिश्चित, किस जगह पर

बाग, वन सुन्दर मिलेंगे।

किस जगह यात्रा खतम हो,

 जायगी, यह भी अनिश्चित,

है अनिश्चित, कब सुमन, कब 

कंटकों के शर मिलेंगे।

6. उपर्युक्त काव्यांश का उचित शीर्षक है-

(अ) जगह की अनिश्चितता

(ब) पथ की पहचान

(स) यात्रा

 (द) फूल और काँटे

‘बटोही’ शब्द का अर्थ है-

(अ) पथिक

(ब) मजदूर

(स) नाविक

(द) बाट जोहने वाला

7. ‘सुमन’ का पर्यायवाची युग्म है—

(अ) कुसुम, अनल, नभ

(ब) मंजरी, दृग, निर्जन

(स) फूल, पुष्प, प्रसून 

(द) कृशानु, कंटक, पुष्प

9. उक्त काव्यांश में कौनसी शब्द-शक्ति का प्रयोग हुआ है ?

(अ) अभिधा

(ब) लक्षणा

(स) व्यंजना

(द) कोई नहीं

10. प्रस्तुत काव्यांश में ‘कंटकों के शर’ का भावार्थ है—

(अ) दुःख

(ब) सुख

(स) रेगिस्तान

(द) बगीचा

उत्तर

6. ब

7. अ

8. स

9. ब

10. अ

11. ‘उन्मेष’ शब्द का अर्थ है-

(अ) प्रकाश

(ब) दीप्ति

(स) उजाला

(द) उपर्युक्त सभी

उत्तर- (द) उपर्युक्त सभी

12. ‘जॉर्ज पंचम की नाक’ कहानी है—

(अ)व्यंग्यात्मक

(ब) संस्मरणात्मक

(स) ऐतिहासिक

(द) बाल मनोवैज्ञानिक

उत्तर- (अ) व्यंग्यात्मक

प्रश्न 2. निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए- 

1.गाय, आदमी, पुस्तक आदि शब्द_______संज्ञा का बोध कराते हैं।

2. जिस सर्वनाम का प्रयोग______ के लिए किया जाता है, उसे प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं। 

3. ऐसे शब्द, जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बतलाते हैं, __________कहलाते हैं।

4. अविकारी शब्द ही_________ शब्द भी कहलाते हैं।

5. ‘अनुज’ शब्द में___________उपसर्ग है।

6. ‘मानवता’ शब्द में मूल शब्द________है।

उत्तर- 1. जातिवाचक 2. प्रश्न करने 3. विशेषण 4. अव्यय 5. अनु 6. मानव।

प्रश्न 3. निम्नलिखित अतिलघूत्तरात्मक प्रश्नों के उत्तर लगभग 20 शब्दों में लिखिए-

1. ‘व्यंजन’ संधि की परिभाषा लिखिए।

उत्तर- व्यंजन का संयोग यदि किसी व्यंजन अथवा स्वर से होता है तो उसे व्यंजन सन्धि कहते हैं। 

2. ‘तत्पुरुष समास’ के दो उदाहरण लिखिए ।

उत्तर- तत्पुरुष समास के दो उदाहरण हैं— (1) गुरु दक्षिणा (2) राजपुत्र । 

3. ‘काठ का उल्लू होना’ मुहावरे का अर्थ लिखिए।

उत्तर-काठ का उल्लू होना मुहावरे का अर्थ ‘महामूर्ख होना’ है।

4. ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ लोकोक्ति का वाक्य में प्रयोग लिखिए।

 उत्तर- प्रयोग – भ्रष्टाचार के आरोप में रमेश को निलंबित कर दिया गया। सच है—जैसी करनी वैसी भरनी

5. यतीन्द्र मिश्र का जन्म कब और कहाँ हुआ ?

उत्तर – यतीन्द्र मिश्र का जन्म सन् 1977 में अयोध्या (उ. प्र.) में हुआ था। 

6. महावीर प्रसाद ने क्या तर्क देकर स्त्री शिक्षा का समर्थन किया?

उत्तर- द्विवेदीजी ने माना है कि पुराने संस्कृत नाटकों की महिलाएँ संस्कृत न बोलकर प्राकृत बोलती थीं, क्योंकि उस समय यह जनसमुदाय की भाषा थी। अतः यह उनके अशिक्षित होने का प्रमाण नहीं है।

7. बच्चे की दंतुरित मुसकान का कवि के मन पर क्या प्रभाव पड़ा?

 उत्तर- बच्चे की दंतुरित मुसकान को देखकर कवि प्रसन्न हो उठा और उसका उदास मन सुन्दर कल्पनाओं में डूब गया।

8. गिरिजा कुमार माथुर की किन्हीं दो रचनाओं के नाम लिखिए। उत्तर-गिरिजा कुमार माथुर की दो रचनाएँ हैं— (1) ‘नाश और निर्माण’ तथा (2) ‘धूप के धान’।

9. ‘संगतकार’ कविता किसके महत्त्व पर विचार करती है? उत्तर-‘संगतकार’ कविता संगतकार की भूमिका के महत्त्व पर विचार करती है।

10. भदंत आनंद कौसल्यायन ने सभ्यता को किसका परिणाम माना है? 

उत्तर-भदंत आनंद कौसल्यायन ने सभ्यता को संस्कृति का परिणाम माना है। 

11. ‘रानी आए और नाक न हो।’ पंक्ति में किसकी नाक न होने की बात कही गई है?

उत्तर-‘रानी आए और नाक न हो।’ पंक्ति में जॉर्ज पंचम की लाट की नाक न होने की बात कही गयी

12. ‘अज्ञेय’ किस विषय के विद्यार्थी रहे हैं? ‘मैं क्यों लिखता हूँ’ पाठ के आधार पर बताइए।

उत्तर- ‘अज्ञेय’ विज्ञान विषय के विद्यार्थी रहे हैं।

खण्ड ब

प्रश्न संख्या 4 से 16 तक के लिए प्रत्येक प्रश्न के लिए अधिकतम उत्तर-सीमा 45 शब्द हैं। 

प्रश्न 4. ‘माता का अंचल’ पाठ से बाल स्वभाव की किस विशेषता का पता चलता है? 

उत्तर- बालक किसी भी सुख-दुःख को अपने मन में नहीं रखते। वे अपनी प्रसन्नता को हँसी के माध्यम से और दुःख को रो-चिल्लाकर प्रकट कर देते हैं। विपदा पड़ने पर वे भागकर अपनी माँ की गोद में जाकर छिपते हैं।

प्रश्न 5. “शांति और अहिंसा की प्रतीक ये पताकाएँ।” इन पताकाओं का क्या महत्त्व बताया गया है? ‘साना-साना हाथ जोड़ि’ पाठ के आधार पर बताइए। 

उत्तर-गतोक की परम्परा के अनुसार ये श्वेत पताकाएँ शान्ति और अहिंसा की प्रतीक होती हैं। इन पर मंत्र लिखे होते हैं। ये संख्या में एक सौ आठ होती हैं। इनको किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु पर उसकी आत्मा की शान्ति के लिए शहर से दूर किसी पवित्र स्थान पर फहराया जाता है जिन्हें फहरा कर उतारा नहीं जाता है और ये धीरे-धीरे अपने आप नष्ट हो जाती हैं।

प्रश्न 6. दुलारी का परिचय टुन्नू से कहाँ और कैसे हुआ?

उत्तर-दुलारी का परिचय टुन्नू से कजली दंगल में तीज के अवसर पर हुआ था। दुक्कड़ पर गानेवालियों में दुलारी का खासा नाम था। उसे पद्य में ही सवाल-जवाब करने की महारत हासिल थी। वह खोजवां वालों की ओर से प्रतियोगी थी और टुन्नू बजरडीहा की ओर से प्रतिद्वन्द्वी था । इस दंगल में दोनों का प्रतियोगी की दृष्टि से आमना-सामना हुआ था। टुन्नू ने दुलारी को अपने आगे इस दंगल में नतमस्तक कर दिया था।

प्रश्न 7. काल के आधार पर क्रिया के भेदों को उदाहरण सहित समझाइये।

उत्तर-काल के आधार पर क्रिया के मुख्यतः तीन भेद होते हैं – ( 1 ) भूतकालिक बीते समय का बोध कराने वाली क्रिया भूतकालिक क्रिया कहलाती है, जैसे- लिखा था।

(2) वर्तमान कालिक-तत्कालीन समय का बोध कराने वाली क्रिया वर्तमान कालिक क्रिया कहलाती है, जैसे-लिख रहा है।

(3) भविष्यत् कालिक- आने वाले समय का बोध कराने वाली क्रिया भविष्यत् कालिक क्रिया कहलाती है, जैसे वह लिखेगा ।

 प्रश्न 8. गोपियों ने ऊधो को बड़भागी क्यों बताया है?

उत्तर- गोपियों ने ऊधो को बड़भागी इसलिए बताया है, क्योंकि वे प्रेम-बंधन से सर्वथा उसी प्रकार मुक्त रहे हैं जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहने पर भी जल से प्रभावित नहीं होता है। उसी प्रकार ऊधो कृष्ण का साथ पाकर भी उनके प्रेम से अप्रभावित रहे हैं।

प्रश्न 9. बालगोबिन भगत अपनी किन चारित्रिक विशेषताओं के कारण साधु कहलाते थे? 

उत्तर- खेती-बाड़ी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत सदा सरल जीवन जीते थे, कबीर के प्रति समर्पित थे। ईश्वर और गुरु प्रशंसा के गीत गाते थे। वे सत्यवादी थे, वे बिना पूछे किसी भी चीज को हाथ नहीं लगाते थे। इसके साथ ही वे समाज में प्रचलित मान्यताओं को नहीं मानते थे। इन्हीं चारित्रिक विशेषताओं के कारण वे साधु कहलाते थे।

प्रश्न 10. ‘यह दंतुरित मुसकान’ कविता का मूल भाव अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर-‘यह दंतुरित मुसकान’ कविता वात्सल्य रस की है। इसमें दाँत निकलते एक शिशु की मुसकान उत्तर-‘ का मनमोहक चित्रण हुआ है। कवि शिशु की मधुर मुसकान पर मुग्ध होकर कहता है कि उसकी मुसकान मुर्दे है । में भी जान डालने वाली है। उसके धूल से सने शरीर को देखकर लगता है कि मानो झोंपड़ी में कमल खिल उठे हों। शिशु की माँ ने उसे कवि से परिचित कराया, उसने कनखियों से कवि को देखा। नजर मिलने पर मुसकराने लगा, उसकी मुसकराहट सचमुच प्राणवान थी।

प्रश्न 11. ‘छाया मत छूना मन, होगा दुःख दूना’ पंक्ति में कवि क्या कहना चाहता है?

उत्तर- ‘छाया मत छूना’ कविता में कवि कहना चाहता है कि बीते दिनों की मधुर स्मृतियाँ वर्तमान जीवन के क्षणों में जाकर उसे परिवर्तित नहीं कर पाती हैं। उनकी यादें वर्तमान और भविष्य को बिगाड़ने वाली ही होती हैं।

प्रश्न 12. “काशी संस्कृति की पाठशाला है।” क्यों? ‘नौबतखाने में इबादत’ पाठ के आधार पर बताइए ।

उत्तर- काशी को संस्कृति की पाठशाला इसलिए कहा गया है, क्योंकि यहाँ भारतीय शास्त्रों का ज्ञान है। कला शिरोमणि यहाँ रहते हैं। यह हनुमान और विश्वनाथ की नगरी है। यहाँ का इतिहास बहुत पुराना है। यहाँ प्रकांड ज्ञाता, धर्मगुरु और कला प्रेमियों का निवास है।

प्रश्न 13. संस्कृति क्या है? अपने शब्दों में लिखिए । 2 उत्तर-संस्कृति का आशय है किसी नए आविष्कार या तथ्य को प्राप्त करने की योग्यता, प्रवृत्ति या प्रेरणा । उदाहरण के लिए, तन को ढकने की भावना और सुई-धागा खोज पाने की योग्यता संस्कृति है। यह मानव मन का गुण है साथ ही किसी भी कार्य की मूल प्रेरणा है, शक्ति और मानव मन का रुझान है।

प्रश्न 14. ‘नाटका में स्त्रियों का प्राकृत बोलना उनके अपढ़ होने का प्रमाण नहीं” उक्त कथन को पाठ के अन्तर्गत आए उदाहरण द्वारा समझाइए । 

 उत्तर – नाटकों में स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा में बोलना उनके अनपढ़ होने का सबूत नहीं है, क्योंकि उस जमाने में प्राकृत ही सर्वसाधारण की भाषा थी। उस समय अनेक ग्रन्थ प्राकृत भाषा में ही रचे गए। भगवान शाक्य मुनि और उनके शिष्य प्राकृत भाषा में ही धर्मोपदेश देते थे । यहाँ तक बौद्धों और जैनों के धर्म-ग्रन्थ भी प्राकृत भाषा में रचे गये।

प्रश्न 15. सूरदास का जीवन परिचय एवं कृतित्व संक्षेप में लिखिए।

उत्तर- प्रमुख कृष्ण भक्त एवं सगुण उपासक सूरदास का जन्म सन् 1478 में तथा निधन सन् 1583 में हुआ माना जाता है। मान्यतानुसार उनका जन्म दिल्ली के निकट ‘सीही ग्राम’ में हुआ था। वे जन्मान्ध थे। महाप्रभु वल्लभाचार्य से दीक्षित अष्टछाप के भक्त कवियों में वे सर्वाधिक प्रसिद्ध थे। ‘सूरसागर’, ‘सूर- सारावली’ एवं ‘साहित्य लहरी’ उनके प्रमुख रचित ग्रंथ हैं।

प्रश्न 16. रामवृक्ष बेनीपुरी का जीवन परिचय एवं कृतित्व संक्षेप में लिखिए। 2 उत्तर- रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म बिहार के बेनीपुर गाँव में सन् 1899 में हुआ था। वे मैट्रिक पास कर स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ गए। पन्द्रह वर्ष की आयु में इनकी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगीं। इन्होंने नाटक, उपन्यास, कहानी, यात्रावृत्तांत, रेखाचित्र लिखे। इस कलम के जादूगर का निधन सन् 1968 में हुआ।

17. निम्नलिखित पठित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए- 

फादर बुल्के संकल्प से संन्यासी थे। कभी-कभी लगता है वह मन से संन्यासी नहीं थे। रिश्ते बनाते थे तो तोड़ते नहीं थे। दसियों साल बाद मिलने के बाद भी उसकी गन्ध महसूस होती थी। वह जब भी दिल्ली आते जरूर मिलते_खोजकर, समय निकालकर, गर्मी, सर्दी, बरसात झेलकर मिलते, चाहे दो मिनट के लिए ही सही। यह कौन संन्यासी करता है? उनकी चिन्ता हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने की थी। हर मंच से इसकी तकलीफ बयान करते, इसके लिए अकाट्य तर्क देते।

उत्तर- प्रसंग- प्रस्तुत अवतरण सर्वेश्वर दयाल सक्सेना द्वारा लिखित संस्मरण ‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ से लिया गया है। इसमें लेखक स्मृतियों के सहारे फादर बुल्के के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों को प्रकट कर रहे हैं।

व्याख्या-लेखक फादर बुल्के के व्यक्तित्व को विस्तार देते हुए कहते हैं कि वे दृढ़ विचारों से युक्त संन्यासी थे। उनको देखकर लगता था कि वे मन से संन्यासी नहीं थे क्योंकि वे रिश्ते बनाते थे और रिश्ते मन से बनते हैं। रिश्ते तोड़ते नहीं थे, जबकि संन्यासी मोह, माया से जुड़े सभी रिश्ते तोड़ कर चलते हैं। दस साल बीतने के बाद भी अगर फादर से मिलना होता था तब भी उस दस साल पहले बने मीठे रिश्ते की महक उनसे महसूस होती थी। लेखक बताते हैं कि फादर जब भी इलाहाबाद से चलकर दिल्ली आते थे तब सर्दी, गर्मी, बारिश की परवाह किये बिना खोजकर हमसे जरूर मिलते, चाहे उनका यह मिलन दो मिनट का ही क्यों न हो। आत्मीयता की यह कड़ी वे हमेशा जोड़े रखते थे। उनके इस व्यवहार पर लेखक कहते हैं कि कौन संन्यासी इतना करता है कि रिश्तों को बनाये रखे। लेखक को फादर के व्यक्तित्व में एक और बात बहुत अच्छी लगती थी, वह थी हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने की चिंता, इसलिए वे हिन्दी के विचार-विमर्श मंच से हमेशा अपनी इस तकलीफ को बताते थे और इस बात पर जोर डालते हुए सुविचारित व सारगर्भित बात कहते थे। उनकी कही बातों का कोई तोड़ किसी के पास नहीं होता था क्योंकि वे हिन्दी के पक्ष में अहम व महत्त्वपूर्ण बातें ही कहते थे।

विशेष- (1) लेखक ने फादर की हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रति चिंता को व्यक्त किया है।

(2) भाषा शैली सरल सहज है।

                              अथवा

आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो इतना तो समझ में आता ही है क्या तो उस समय मेरी उम्र थी और क्या मेरा भाषण रहा होगा। यह तो डॉक्टर साहब का स्नेह था जो उनके मुँह से प्रशंसा बनकर बह रहा था या यह भी हो सकता है कि आज से पचास साल पहले अजमेर जैसे शहर में चारों ओर से उमड़ती भीड़ के बीच एक लड़की का बिना किसी संकोच और झिझक के यों धुआँधार बोलते चले जाना ही इसके मूल में रहा हो।

उत्तर-प्रसंग-प्रस्तुत अवतरण लेखिका मन्नू भंडारी द्वारा लिखित आत्मकथ्य ‘एक कहानी यह भी’ से लिया गया है। लेखिका अपने पीछे गुजरे समय को याद करती है तथा पिता के विचारों पर मंथन भी करती है।

व्याख्या-लेखिका कहती है कि सब कुछ होने के बाद जब पीछे मुड़कर देखती हूँ तो इतना ही समझ आता है कि क्या तो उस समय मेरी आयु थी और किस तरह का मेरा भाषण रहा होगा? या फिर यह भी हो सकता है कि आज से पचास साल पहले बिना संकोच के अजमेर जैसे छोटे शहर में बिना झिझक के एक लड़की के धुआँधार बोलते चले जाना। यही बात जरूर डॉ. साहब की प्रशंसा के मूल में रही होगी या फिर स्नेह ही इसका कारण हो सकता है।

विशेष-

 (1) लेखिका अपने पिता के अंतर्विरोधों को स्पष्ट करती है। विशिष्टता और सामाजिक अच्छी छवि दोनों में अन्तर्भेद है, को व्यक्त करती है।

(2) भाषा शैली प्रवाहमय है। शब्दों का वाक्य-विन्यास अद्भुत है।

प्रश्न 18. निम्नलिखित पठित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए- 

फटिक सिलानि सौं सुधार्थी सुधा मंदिर,

उदधि दधि को सो अधिकाइ उमगे अमंद। बाहर ते भीतर लौं भीति न दिखैए ‘देव’, दूध को सो फेन फैल्यो आँगन फरसबंद ॥

उत्तर- प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश रीतिकाल के कवि देव द्वारा रचित ‘कवित्त’ से लिया गया है। इस पद में पूर्णिमा की रात में चाँद-तारों से भरे आकाश की सुन्दरता का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-कवि पूर्णिमा की रात में चाँद-तारों से भरे आकाश की आभा का वर्णन करता हुआ कहता है कि चाँदनी रात बहुत ही उज्ज्वल और शोभायमान हैं। आकाश को देखकर ऐसा लगता है कि मानो स्फटिक की साफ चमकदार शिलाओं से चाँदनी का कोई भव्य मन्दिर बनाया गया हो। उसमें दही के सागर के समान चाँदनी की शोभा अधिक गति के साथ उमड़ रही हो। इस मन्दिर में बाहर से भीतर तक कहीं भी दीवार दिखाई नहीं दे रही है। आशय यह है कि सारा मन्दिर पारदर्शी है। मन्दिर के आँगन में दूध के झाग के समान चाँदनी का विशाल फर्श बना हुआ है।

विशेष- (1) पूर्णिमा की सौन्दर्यमयी रात्रि के सौन्दर्य का मनोरम वर्णन प्रस्तुत है।

(2) रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण अलंकार, श्रृंगार रस, कवित्त छन्द तथा प्रसाद गुण से युक्त कवि की सुन्दर रचना है।

अथवा

बादल, गरजो!-

घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ! ललित ललित, काले घुँघराले,

बाल कल्पना के से पाले, विद्युत छबि उर में, कवि, नवजीवन वाले! वज्र छिपा, नूतन कविता फिर भर दो- बादल, गरजो!

उत्तर- प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित कविता ‘उत्साह’ से लिया गया है। यह एक आह्वान गीत है। वे बादलों को बरसने को कहते हैं क्योंकि बादल नई चेतना, नये अंकुर को जन्म देते हैं।

व्याख्या- उपरोक्त पंक्तियों में कवि निराला ने उस सुन्दर वातावरण का वर्णन किया है जब आकाश काले- काले बादलों से भर जाता है। बिजली चमकने और बादलों के गर्जन का शोर होता है। तब कवि बादल को सम्बोधित करता हुआ कहता है कि हे बादल। तुम गरजो! समस्त आकाश को घेर घेर कर मूसलाधार वर्षा करो। हे बादल! तुम अत्यन्त सुन्दर हो। तुम्हारा स्वरूप छोटे बालक के समान है जिसके सिर पर काले घुँघराले बाल हैं,

यहाँ बादलों का मानवीकरण किया गया है। कवि कहते हैं कि ‘ओ काले रंग के सुन्दर-सुन्दर घुंघराले बादल, तुम पूरे आसमान को घेरकर जोरदार ढंग से गर्जना करो।’ तुम अबोध बालकों की कल्पना के समान पाले गये हो। तुम अपने हृदय में बिजली की शोभा को धारण करते हो। तुम नवीन सृष्टि करने वाले हो। तुम जलरूपी नवीन जीवन प्रदान करने वाले हो। तुम्हारे अन्दर वज्रपात की शक्ति छिपी हुई है अर्थात् परिवर्तन करवाना ही तुम्हारा नियम है। तुम मेरे हृदय में नयी कविता को जन्म दो और संसार को फिर से नवीन प्रेरणा से भर दो। हे बादल! तुम गरजो। यहाँ बादलों के माध्यम से कवि नवयुवकों में उत्साह का संचार करते हैं।

विशेष- (1) कवि द्वारा बादलों का सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया गया है, बादल पौरुष और क्रांति का प्रतीक बताया गया है।

(2) पद्यांश में प्रयुक्त भाषा खड़ी बोली हिन्दी तथा मुक्त छन्द है। उपमा अलंकार तथा तत्सम शब्द का प्रयोग है

(3) भाषा सरल व सहज ही ग्रहणीय है।

प्रश्न 19. लक्ष्मण व परशुराम के मध्य हुए संवाद को उदाहरण सहित लिखिए। 

 उत्तर-लक्ष्मण और परशराम के मध्य हुए संवाद को निम्न प्रकार से संक्षेप में यहाँ वर्णित किया जा रहा है— लक्ष्मण-हे मुनिवर! हमने बचपन में न जाने कितनी धनुहियाँ (छोटे धनुष) तोड़ डालीं, तब आपने क्रोध नहीं किया। फिर इस धनुष पर आपकी इतनी ममता क्यों?

परशुराम हे राजपुत्र ! लगता है तेरी मृत्यु आ गई है। इसीलिए तू सँभलकर बोल नहीं पा रहा | तू शिव-धनुष को धनुही के समान बता रहा है जबकि इस धनुष के बारे में संसार भर को पता है। है

लक्ष्मण- (व्यंग्य से) हे देव! हमने तो यही जाना था कि सारे धनुष एक जैसे ही होते हैं। फिर राम ने इसे नए के धोखे में देखा था। यह तो छूते ही टूट गया। इसमें उनका क्या दोष है?

परशुराम- अरे मूर्ख ! लगता है तू मेरे स्वभाव को अभी नहीं जानता है। मैं तुझे बालक समझकर छोड़ रहा हूँ। तू मुझे निरा मुनि समझ रहा है। मैं बाल-ब्रह्मचारी हूँ। मैंने कई बार इस पृथ्वी के सारे राजाओं का संहार किया है। मैंने सहस्रबाहु की भुजाएँ काट डाली हैं। इतना ही नहीं, मेरे फरसे की कठोरता के भय से गर्भ के बच्चे भी गिर जाते हैं।

लक्ष्मण- (व्यंग्य से) वाह मुनिजी! आप तो बहुत बड़े योद्धा हैं। आप बार-बार मुझे अपना कुठार दिखाकर डराना चाहते हैं। आपका बस चले तो फूँक मार कर पहाड़ को उड़ा दें। मैं कोई छुई-मुई का फूल नहीं हूँ जो तर्जनी देखकर मुरझा जाऊँगा। मैं आपको ब्राह्मण समझ कर चुप रह गया हूँ। हमारे कुल में गाय, ब्राह्मण, देवता और भक्तों पर वीरता नहीं दिखाई जाती है। फिर आपके वचन ही करोड़ों वज्रों के समान घातक हैं। आपने शस्त्र तो व्यर्थ में ही धारण कर रखे हैं।

अथवा

‘आत्मकथ्य’ कविता के मूल भाव पर विस्तृत प्रकाश डालिए। 

उत्तर- ‘आत्मकथ्य’ कविता छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित है। इसमें कवि अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है। कभी संसार की नश्वरता पर विचार करता है कि दुःखों से भरा यह जीवन नाशवान है। कठिनाइयों और परेशानियों के अलावा इसमें बताने को कुछ भी नहीं है, कवि का कहना है कि उसके जीवन की गागर तो खाली है। वह भला दूसरों को क्या दे सकता है? वह अपनी भूलों और दूसरों की रचनाओं को उजागर नहीं करना चाहता क्योंकि इसका कोई लाभ नहीं है। यह ठीक है कि कवि के जीवन में सुखद क्षण आये थे। जिसमें प्रेयसी के साथ हिलमिल कर समय व्यतीत किया था। पर वे क्षण कुछ ही पल टिक पाये। सुख उनके निकट आते-आते चले जाते थे। और कवि उन क्षणों की प्रतीक्षा ही करते रहते थे। वे अपनी प्रियतमा के सौन्दर्य की भी प्रशंसा करते हैं, उसके गालों की लाली उषा के लिए भी ईर्ष्या का विषय थी। पर इन सब बातों को अब कहने का कोई लाभ नहीं है। उसकी कथा में दूसरों को कुछ भी नहीं मिल पायेगा।

प्रश्न 20. ‘नेताजी का चश्मा’ पाठ के आधार पर बताइये कि सेनानी न होते हुए भी चश्मे वाले को लोग कैप्टन क्यों कहते थे?

 उत्तर- सेनानी न होते हुए भी चश्मे वाले को लोग कैप्टन इसलिए कहते थे, क्योंकि उसके मन में देशभक्ति की भावना प्रबल थी। वह चश्मे वाला न तो सेनानी था, न नेताजी का साथी था फिर भी वह नेताजी सुभाषचंद्र का बहुत सम्मान करता था। वह सुभाषचंद्र जी की बिना चसमे वाली मूर्ति देखकर आहत था, इसलिए वह अपनी और से नेताजी की मूर्ति पर चश्मा लगाता था । उसकी इसी भावना को देखकर लोग उसे सुभाषचंद्र का साथी या सेना का कैप्टन कहकर पुकारते थे। चाहे वे मजाक उड़ाने की मुद्रा में उसे कैप्टन कहते हो लेकिन वह कस्बे का अगुआ था।

अथवा

‘एक कहानी यह भी’ पाठ मन्नू भंडारी के साधारण लड़की से असाधारण बनने के प्रारम्भिक पड़ावों को प्रकट करता है। समझाइये।

उत्तर – मन्नू भंडारी बचपन में एक साधारण-सी लड़की की भाँति अपने परिवार में बहन, भाइयों तथा पड़ोसी बच्चों के साथ विभिन्न प्रकार के खेल घर में ही खेला करती थी। लेकिन वय वृद्धि के साथ ही उनके व्यक्तित्व पर दो व्यक्तियों का प्रभाव पड़ा जिसने साधारण-सी लड़की को असाधारण बना दिया। वे घर में पिता के साथ होने वाली राजनैतिक बहसों को सुनकर जहाँ देश और समाज के प्रति जागरूक बनी वहीं प्रो. शीला अग्रवाल का सम्पर्क पाकर क्रान्तिकारी और विद्रोही बनी।

खण्ड द

प्रश्न 21. निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर 300-350 शब्दों में एक सारगर्भित निबंध लिखिए-

(अ) मातृभाषा और उसका महत्त्व 

(1) मातृभाषा का अर्थ एवं परिभाषा 

(2) रचनात्मक विकास में मातृभाषा का योगदान

(3) मातृभाषा व राष्ट्रभाषा

(4) उपसंहार

(ब) मेरा प्रिय नेता 

(1) नेता का अर्थ

(2) राजनीति की परिभाषा

(3) प्रिय नेता का नाम व परिचय

(4) प्रिय नेता का आपके व्यक्तित्व पर प्रभाव

(स) मेरी अविस्मरणीय यात्रा

(1) अपना परिचय

(2) आपके द्वारा की गई यात्राओं का ब्यौरा

(3) आपकी अविस्मरणीय यात्रा का वर्णन

(4) आपके जीवन पर प्रभाव

(द) राजस्थान के मेले

(1) मेलों का सांस्कृतिक महत्त्व 

(2) मेलों का आर्थिक महत्त्व

(3) राजस्थान के प्रसिद्ध मेले

 (4) उक्त मेलों की पौराणिक कथाएँ

उत्तर-

(अ) मातृभाषा और उसका महत्त्व

( 1 ) मातृभाषा का अर्थ एवं परिभाषा मातृभाषा का अर्थ है-माता द्वारा सीखी गई भाषा। बच्चा जिस परिवेश में रहता है, उसके घर-परिवार और आस-पड़ोस में जो भाषा बोली और समझी जाती है तथा समाज में जिस भाषा का व्यवहार होता है, सामान्यतया उसे ही मातृभाषा कहते हैं। व्यापक अर्थ में जिस जन्म- परिवेश पर हम पैदा हुए, बड़े हुए, इस दौरान जन्म क्षेत्र या जन्म-परिवेश में बोली जाने वाली भाषा ही हमारी मातृभाषा कहलाती है।

(2) रचनात्मक विकास में मातृभाषा का योगदान- रचनात्मक विकास का मातृभाषा से अटूट संबंध है, क्योंकि बालक जितनी शीघ्रता से अपनी मातृभाषा में सीख सकता है, उतनी शीघ्रता से वह अपने देश की भाषा या विदेशी भाषा में नहीं सीख सकता है। इसी आधार पर प्रायः सभी भाषाविद् तथा मनोविज्ञानी यह मानते आए हैं कि बालक को अपनी मातृभाषा के माध्यम से ही प्रारंभिक शिक्षा दी जानी चाहिए। इससे उसका रचनात्मक विकास सहजता से होता जाता है। इसलिए नई शिक्षा नीति में विज्ञान और चिकित्सा की शिक्षा भी मातृभाषा में अध्ययन करने का विकल्प दिया है। मातृभाषा से जो रचनात्मक विकास होता है, वह सहज और स्थायी होता है और बिना किसी दबाव के होता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने उचित ही कहा है-

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।

बिन निज भाषा ज्ञान के, चुभत हिय में शूल ॥

(3 ) मातृभाषा व राष्ट्रभाषा हमारे देश की सांस्कृतिक परम्पराएँ बहुत विकसित हैं। यहाँ अनेक धर्म, सम्प्रदाय और जातियों के लोग बिना किसी आपसी भेदभाव के मिलकर निवास करते हैं। उन सब की अपनी- अपनी भाषा और संस्कृतियाँ हैं । इस आधार पर कहा जा सकता है कि हमारे विशाल देश में अनेक मातृभाषाएँ हैं। एक अनुमान के अनुसार हमारे देश में 1500 से भी अधिक बोलियाँ अथवा मातृभाषाएँ हैं। इसी कारण हमारे संविधान में भी 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है। ये सभी भाषाएँ अपने क्षेत्र विशेष की मातृभाषाएँ ही तो हैं जिनको क्षेत्र विशेष के जन सहजता से बोलते हैं और बोलने में गर्व महसूस करते हैं। इसी क्रम में यदि देखा जाए तो हमारे देश में जो भाषा सर्वाधिक व्यवहार में आती है, वह हिन्दी है। हिन्दी ही अधिकांश भारतीयों की मातृभाषा है। इसके साथ ही वह हमारी राष्ट्रभाषा भी है। भारतीय संविधान में उसे राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित किया गया है और समस्त राज-काज हिन्दी में ही करने के लिए निर्देशित किया गया है लेकिन पनपी गुलामी की मानसिकता के कारण हम अपना राजकाज आज भी अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं में करने में शिक्षित होने की शान समझते हैं और हम अपनी राष्ट्रभाषा की उपेक्षा करते हैं। इस कारण जो देश की राष्ट्रभाषा को सम्मान मिलना चाहिए, वह हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी को अभी तक प्राप्त नहीं हो पाया है।

(4) उपसंहार-संक्षेप में कहा जा सकता है कि मातृभाषा श्रेष्ठ है, क्योंकि मातृभाषा ही हमें आत्मविश्वासी व योग्य बनाती है। हमें हमारी संस्कृति से जोड़े रखती है। अपनी सांस्कृतिक विरासत को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाती है। हर भारतवासी को अपनी और अपने देशवासियों की भिन्न-भिन्न मातृभाषाओं का पूरा सम्मान करना चाहिए।

(ब) मेरा प्रिय नेता ( युग पुरुष महात्मा गाँधी ) (1) नेता का अर्थ-चल पड़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर।

पड़ गयी जिधर भी एक दृष्टि, उठ गये कोटि दृग उसी ओर ॥

(सोहन लाल द्विवेदी) कवि द्विवेदीजी ने उपर्युक्त श्रद्धामय भाव युग-पुरुष महात्मा गाँधी के प्रति व्यक्त किए हैं जो सच्चे अर्थों में हमारे प्रिय नेता थे। नेता का अर्थ है— नेतृत्व करने वाला। जो अपने सत् कार्यों से समाज और देश का नेतृत्व करता है, वही सच्चे अर्थों में नेता कहलाता है। परमार्थ भाव से युक्त महात्मा गाँधी की तरह हमारे देश में कई नेता हुए हैं जिन्होंने अपने सत्कार्यों एवं सत्प्रयासों से देश और समाज की प्रगति में अविस्मरणीय योगदान दिया है। परिणामस्वरूप हम आज स्वाभिमानपूर्वक स्वतन्त्र श्वास ले रहे हैं और देश व समाज को निरन्तर प्रगति पथ पर विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ा रहे हैं।

(2) राजनीति की परिभाषा – देश व समाज के हित में शासन द्वारा जिस नीति का निर्धारण किया जाता है, सामान्य अर्थ में ही उसे राजनीति कहा जाता है। स्वतन्त्रता के पश्चात् निर्मित संविधान के अन्तर्गत देश और समाज के विकास के हित में शासन द्वारा समय-समय पर अनेक नीतियाँ बनायी जाती हैं। ये सभी नीतियाँ राजनीति के अन्तर्गत आती हैं। इनका मूल उद्देश्य विकास पर ही आधारित होता है। यह अलग बात है कि आज के राजनीतिज्ञ, भ्रष्ट नेता देश और समाज की प्रगति की ओर उतना ध्यान नहीं देते हैं जितना अपने स्वार्थ पूर्ति पर ।

( 3 ) प्रिय नेता का नाम व परिचय- जैसाकि पूर्व में कहा जा चुका है कि हमारे प्रिय नेता का नाम महात्मा गाँधी था। हिंसा के बदले अहिंसा की लाठी लेकर चलाने वाले इस नेतृत्वकर्ता पुरुष का जन्म 2 अक्टूबर सन् 1869 को गुजरात प्रान्त के काठियावाड़ के पोरबन्दर नामक स्थान पर हुआ था। इनका बचपन का नाम मोहनदास कर्मचन्द गाँधी था। 13 वर्ष की अवस्था में ही इनकी ‘कस्तूरबा’ से शादी हो गई थी। गाँधीजी ने सन् 1887 में हाई स्कूल परीक्षा पास की तथा सन् 1888 में बैरिस्टरी पास करने के लिए इंग्लैण्ड चले गये। बैरिस्टर बनकर सन् 1892 में वापिस आए और देश सेवा में लग गए। एक बार उन्हें एक मुकदमे की पैरवी के लिए अफ्रीका जाना पड़ा। उन दिनों अफ्रीका में भारतीयों के प्रति बड़ा ही अपमानजनक रवैया अपनाया जाता था। इसे वह सहन न कर सके और इन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध सत्याग्रह आन्दोलन छेड़ दिया और सफल भी हुए। अफ्रीका से लौटकर गाँधीजी देश सेवा में जुट गए और अहिंसा व सत्य का सहारा लेकर देश को परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त कराया।

( 4 ) प्रिय नेता का आपके व्यक्तित्व पर प्रभाव- गाँधीजी हमारे प्रिय नेता थे, उनका व्यक्तित्व सत्य,अहिंसा, कर्त्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी से पूरित था। वे ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के पोषक, निर्भीक और साहसी थे।

इसके साथ ही वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षपाती थे। वे सद्गुणों की खान थे। उनके व्यक्तित्व में समाये उन सभी सद्गुणों का प्रभाव हमारे व्यक्तित्व में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पड़ा अनुभव किया जा सकता है

क्योंकि हम हमेशा ही उनके बताए रास्ते पर चलने का प्रयास करते हैं।

(स) मेरी अविस्मरणीय यात्रा

(1) अपना परिचय-मैं दसवीं कक्षा का छात्र हूँ और राजकीय माध्यमिक विद्यालय में अध्ययन करता हूँ। यह विद्यालय हमारे गाँव के पास ही स्थित है। हमारा पूरा परिवार गाँव में ही रहता है। हमारे बड़े परिवार में दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ ताई, माता-पिता के साथ दो भाई और एक बहिन भी रहते हैं। मेरे पिता के अलावा शेष पुरुष परिवारीजन खेती का कार्य करते हैं। मेरे पिताजी राजकीय विद्यालय में अध्यापक हैं। भाई और बहिन अध्ययन हैं। मैं भी विद्यालय से आने के बाद घरवालों के साथ खेती में हाथ बँटाता हूँ, घर का भी काम करता हूँ। शेष समय में पढ़ता और खेलता हूँ।

(2) आपके द्वारा की गई यात्राओं का ब्यौरा-पढ़ने-लिखने के साथ मुझे यात्रा करने का भी शौक है। जब भी विद्यालय में अवकाश होता है, पिताजी से आज्ञा लेकर यात्रा पर किसी न किसी परिचित के साथ चला जाता हूँ, क्योंकि यात्रा करने में मुझे बहुत ही आनन्द की अनुभूति होती है। अब तक मैंने अवकाश के दिनों में कई पास और दूर की यात्राएँ की हैं जैसे पुष्कर की यात्रा, चित्तौड़गढ़ की यात्रा, रामदेवरा की यात्रा, दिलवाड़ा की यात्रा, केलवाड़ा की यात्रा आदि। ये सभी यात्राएँ मेरे द्वारा बस या रेलगाड़ी की सुविधा के अनुसार की गयी हैं।

( 3 ) आपकी अविस्मरणीय यात्रा का वर्णन-ग्रीष्मकाल हो चुका था। मेरा मित्र श्याम अपने पिताजी के साथ आगरा जाना चाहता था। उसने मुझसे भी चलने का आग्रह किया। मैंने पिताजी से आज्ञा प्राप्त कर यात्रा की तैयारी की और निर्धारित तिथि पर रेलवे स्टेशन पर पहुँच गया। आगरा के लिए रात 10 बजे गाड़ी चली। मैं श्याम और उसके पिताजी के साथ गाड़ी में बैठ गया। गाड़ी में स्थान मिल जाने से हम प्रसन्न थे। सुबह होते-होते गाड़ी आगरा फोर्ट स्टेशन पहुँच गयी। हम सब उतरे और ताँगे में सामान रखकर होटल की ओर चल पड़े। होटल में पहुँचकर सामान रखा और स्नानादि से निवृत होकर नाश्ता किया। इसके बाद हम आगरा के प्रसिद्ध किले को देखने गए। किले के द्वार पर हमें एक गाइड मिल गया। उसकी सहायता से हमने किले के प्रत्येक भाग को खूब अच्छी तरह देखा। इसके बाद ताँगे में बैठकर संसार के सात आश्चर्यों में से एक प्रसिद्ध आश्चर्य ताजमहल को देखने गए। सामने सफेद संगमरमर के विशाल चौकोर चबूतरे पर खड़ा ताजमहल आगन्तुकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। ताजमहल की शिल्पकला और वास्तुकला को देखकर हम लोग स्तब्ध हो गये। वहाँ की हरी-हरी मुलायम दूब पर बैठकर हमने विश्राम और आमोद-प्रमोद किया। कैमरे से अनेक चित्र भी लिए। शाम को ताँगे पर बैठकर होटल आ गए। होटल में भोजन किया और सामान लेकर स्टेशन के लिए रवाना हो गए। सुबह होते-होते रेलगाड़ी जयपुर पहुँच गयी और हम उतर कर अपने गाँव की ओर चल दिए।

( 4 ) आपके जीवन पर प्रभाव- इस रोचक यात्रा के किस्से हमने जिसे भी सुनाये, उसने हमारे उत्साह और जिंदादिली की प्रशंसा की। जिससे मुझे लगा कि जैसे मेरी मानसिक और शारीरिक सारी यात्रा की थकान दूर हो गयी। इसके साथ ही मेरी समझ में आया कि यात्रा करना न केवल ज्ञान वृद्धि के लिए ही उपयोगी होता है, बल्कि वातावरण और स्थिति में परिवर्तन होने से ताजगी और नया उत्साह भी मिलता है। साथ ही मनुष्य के व्यक्तित्व विकास में भी यात्राओं का अमूल्य योगदान होता है।

(1) मेलों का सांस्कृतिक महत्त्व-मेला ‘मेल’ शब्द से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है-मिलना। जब किसी स्थान पर किसी धार्मिक, सामाजिक अथवा किसी अन्य उद्देश्य को लेकर लोग एकत्र होते हैं तो उसको मेला कहते हैं। मेला लोगों को मिलाने का कार्य करता है। साथ ही मेले के माध्यम से लोग एक-दूसरे की संस्कृति से परिचित होते हैं। उनसे मिलकर सम्बन्ध जोड़ते हैं। अतः इन मेलों का अपना सांस्कृतिक महत्त्व होता है।

(2) मेलों का आर्थिक महत्त्व- मेले सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। मेलों में लोग दूर-दूर से आकर एक-दूसरे से मिलते हैं तथा वहाँ से अपनी-अपनी आवश्यकता की चीजें खरीदते हैं। गाँवों के आस-पास लगने वाले मेले छोटे-मोटे बाजार का रूप लिए होते हैं। ये मेले एक-दूसरे की आवश्यकता की पूर्ति करते हैं और उनको सन्तोष प्रदान करते हैं। इन आयोजित होने वाले मेलों में अर्थ का आदान-प्रदान होता है। इस कारण मेलों का अपना आर्थिक महत्त्व है।

( 3 ) राजस्थान के प्रसिद्ध मेले-राजस्थान में विशेष धार्मिक पर्वों पर, तीर्थ स्थानों पर मेले निर्धारित समय पर भरते हैं। इन प्रसिद्ध मेलों में पुष्कर, दिलवाड़ा, परबतसर, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, गोगामेड़ी आदि के मेले प्रमुख हैं। इन मेलों का आयोजन अपने-अपने निर्धारित समय और मान्यता के अनुरूप होता है।

(4) उक्त मेलों की पौराणिक कथाएँ- उक्त मेलों के साथ उनकी पौराणिक कथाएँ जुड़ी होती हैं। जिससे इन मेलों की धार्मिक मान्यता और आस्था और बढ़ जाती हैं। ये मेले अपनी उसी आस्था के अनुसार निर्धारित स्थल पर निर्धारित तिथि पर आयोजित किए जाते हैं। जैसे पुष्कर का मेला कार्तिक में, दिलवाड़ा का मेला चैत्र में, परबतसर का मेला भादो में, कोलायत का मेला कार्तिक में, चारभुजा (मेवाड़) का मेला भादो में, केसरियानाथ (धुलैव, मेवाड़) का मेला चैत्र में, रामदेवरा (पोकरण-जोधपुर) का मेला भादों में, श्री महावीरजी का मेला चैत्र में, राणी सती (झुंझुनूं) का मेला भादो में, केलवाड़ा (कोटा) का मेला बैसाख में भरता है। इन प्रमुख मेलों के अलावा राजस्थान में अन्य मेले भी स्थानीय मान्यता और पौराणिक कथाओं के आधार पर भरते हैं। इन आयोजित किए जाने वाले मेलों का अपना ही महत्त्व है।

प्रश्न 22. स्वयं को आदर्श नगर, बीकानेर का नीरव मानते हुए अशोक नगर, जयपुर निवासी

अपने मित्र को बहिन की शादी में बुलाने हेतु निमन्त्रण पत्र लिखिए।

उत्तर-

                                                                                                                                      18, आदर्श नगर,

                                                                                                                                      बीकानेर।

                                                                                                                                  दिनांक : 21 नवम्बर, 20XX

प्रिय अजय,

          नमस्कार !

आपको यह जानकर हर्ष होगा कि दिनांक 30 नवम्बर, 20Xx को मेरी बहिन मुन्नी का शुभ विवाह प्रो. सुधांशु सिंघल (सुपुत्र श्री हिमांशु सिंघल, जिला शिक्षा अधिकारी, बीकानेर) के साथ होने जा रहा है। आपसे आग्रह है कि उस शुभ अवसर पर सपरिवार पधार कर नव-विवाहित वर-वधू को आशीर्वाद प्रदान करें।

आप इस निमंत्रण को औपचारिक न समझें। आपको उक्त तिथि से एक दिन पूर्व अवश्य ही यहाँ पहुँचना चाहिए। आपके आ जाने से हमें उचित परामर्श एवं सहायता मिल सकेगी। आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि आप सपरिवार पधारकर अनुग्रहीत करेंगे।

आपके आने की प्रतीक्षा में।

                                                                                                                                             आपका स्नेही मित्र 

                                                                                                                                                         नीरव 

                                                                              अथवा

अपनी प्रधानाचार्या को अंग्रेजी विषय के अध्यापक का पद रिक्त होने के कारण कोई अतिरिक्त व्यवस्था हेतु प्रार्थना-पत्र लिखते हुए कक्षा कक्ष अध्ययन की वस्तुस्थिति से अवगत कराइए।

सेवा में,

श्रीमती प्रधानाचार्या जी,

राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय,

मकराना।

विषय-विद्यालय में अंग्रेजी विषय के अध्यापक का पद रिक्त होने के कारण अतिरिक्त व्यवस्था करने के सम्बन्ध में।

महोदया,

           निवेदन है कि लगभग दो माह से हमारी कक्षा में अंग्रेजी विषय के अध्यापक की कमी के कारण अध्यापन व्यवस्था बाधित हो रही है। इस विषय के कालांश में जो अन्य अध्यापक आते हैं, वे अंग्रेजी विषय का अध्यापन न कराकर अपने-अपने विषय का ही अध्यापन करा जाते हैं। इस कारण कक्षा में अंग्रेजी विषय की पढ़ाई नहीं हो रही है।

अतः आपसे प्रार्थना है कि विषयाध्यापक की कमी दूर करने के लिए अन्य ‘अंग्रेजी विषय’ के अध्यापक की स्थायी व्यवस्था करने की कृपा करें, जिससे हमारा उक्त विषय का अध्ययन कार्य सुचारु रूप से संचालित हो सके और समय पर हमारा विषय-पाठ्यक्रम भी पूरा हो सके।

आशा है कि आप हमारी इस प्रार्थना पर अविलम्ब ध्यान देकर हमें अनगृहीत करेंगी।

                                                                                                                                                         प्रार्थी,

                                                                                                                                                       कक्षानायक

                                                                                                                                                         कक्षा -X

                                                                                                                                    राज. उच्च माध्य. विद्यालय

                                                                                                                                                           मकराना

दिनांक 10 अक्टूबर, 20XX

 प्रश्न 23. ‘नव-अंकुर विधवा महिला सहायता संस्था, जयपुर द्वारा बनाई गई कारपेट की बिक्री हेतु एक विज्ञापन लिखिए। 

उत्तर- 

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